क्या कंपनी की सेल्स ग्रोथ के पीछे कीमतों में की गई बढ़ोतरी है या शुद्ध रूप से वॉल्यूम ग्रोथ काम कर रही है?[cite: 1]
जवाब: अगर ग्रोथ सिर्फ प्रोडक्ट का दाम बढ़ाने से आ रही है (महंगाई के कारण), तो एक समय बाद ग्राहक घट जाएंगे। असली और सुरक्षित ग्रोथ ज्यादा माल (Volume) बिकने से आती है।
क्या कंपनी की सेल्स ग्रोथ रेट उसकी पूरी इंडस्ट्री की औसत ग्रोथ रेट के मुकाबले काफी तेज है?[cite: 1]
जवाब: इसका मतलब है कि कंपनी अपने प्रतिद्वंद्वियों (Competitors) से मार्केट शेयर छीन रही है और सेक्टर का असली लीडर बन रही है।
क्या कंपनी का सेल्स ऑर्गेनाइजेशन मंदी के दौर में भी अपने कॉम्पिटिटर्स से मार्केट शेयर छीन रहा है?[cite: 1]
जवाब: मंदी के समय कमजोर कंपनियां बाहर हो जाती हैं। जो कंपनी उस वक्त भी अपनी सेल्स बढ़ा ले, उसके पास एक भयंकर और एफिशिएंट डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क होता है।
क्या कंपनी का 50% से अधिक रेवेन्यू सिर्फ 2 या 3 बड़े ग्राहकों पर निर्भर तो नहीं है?[cite: 1]
जवाब: अगर कंपनी सिर्फ 2 ग्राहकों पर निर्भर है, तो कल को एक भी क्लाइंट के जाने पर कंपनी की आधी सेल्स एक झटके में क्रैश हो जाएगी (Client Concentration Risk)।
क्या कच्चे माल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर होने के बावजूद कंपनी अपने ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन को डिफेंड कर पा रही है?[cite: 1]
जवाब: यह साबित करता है कि कंपनी के पास 'प्राइसिंग पावर' है। वह कच्चे माल की लागत का बोझ आसानी से अपने कस्टमर पर डाल सकती है।
क्या कंपनी के मार्जिन्स मे सुधार किसी वन टाइम कॉस्ट कटिंग की वजह से है या कुशल मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस के कारण है?[cite: 1]
जवाब: कई बार कंपनियां कर्मचारियों को निकालकर या R&D का खर्च रोककर मार्जिन बढ़ा दिखाती हैं, जो लंबे समय के लिए घातक है। मार्जिन सुधार असली प्रोसेस से आना चाहिए।
क्या कंपनी का ऑपरेटिंग मार्जिन प्रोफाइल उसकी पूरी इंडस्ट्री के औसत मार्जिन के मुकाबले सुपीरियर है?[cite: 1]
जवाब: यदि बाकी सब 10% कमा रहे हैं और आपकी कंपनी 20%, तो इसका सीधा अर्थ है कि उसके पास कोई प्रीमियम प्रोडक्ट या मोनोपोली है।
क्या कंपनी अपने मौजूदा फिक्स्ड एसेट्स के मुकाबले कम से कम 20% से 25% या उससे बड़ा नया केपेक्स कर रही है?[cite: 1]
जवाब: छोटा-मोटा केपेक्स केवल मेंटेनेंस के लिए होता है। भविष्य में भयंकर ग्रोथ के लिए एक बड़ा और अग्रेसिव क्षमता विस्तार (Expansion) जरूरी है।
क्या बैलेंस शीट के अंदर कैपिटल वर्क इन प्रोग्रेस का नंबर हर तिमाही घट रहा है और फिक्स्ड एसेट्स बढ़ रहा है?[cite: 1]
जवाब: यह इस बात का सबूत है कि जो फैक्ट्री बन रही थी (CWIP), वह अब पूरी तरह तैयार होकर कमर्शियल प्रोडक्शन (Fixed Assets) में बदल गई है।
क्या मैनेजमेंट ने नए केपेक्स के चालू होने के बाद आने वाले सालों के लिए रेवेन्यू विज़िबिलिटी का स्पष्ट गाइडेंस दिया है?[cite: 1]
जवाब: प्लांट बनने के बाद माल बिकेगा या नहीं? मैनेजमेंट की कॉन-कॉल में यह चेक करना जरूरी है कि नए प्लांट के लिए एडवांस डिमांड या आर्डर बुक मौजूद है या नहीं।
क्या इस बड़े केपेक्स को लगाने के लिए कंपनी ने भारी डेट लिया है या इसे अपने इंटरनल फ्री कैश फ्लो से फंड किया है?[cite: 1]
जवाब: अगर केपेक्स के लिए बहुत भारी लोन लिया गया है, तो प्लांट में 1 साल की भी देरी होने पर कंपनी ब्याज भरते-भरते बर्बाद हो सकती है। कैश फंडेड केपेक्स सुरक्षित होता है।
क्या कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो पिछले 3 से 5 सालों में उसके रिपोर्टेड नेट प्रॉफिट के बराबर या उससे अधिक है?[cite: 1]
जवाब: नेट प्रॉफिट कागजों पर मैनेज हो सकता है। अगर CFO प्रॉफिट से कम है, तो मतलब कंपनी पैसा कमा नहीं रही, बल्कि उसका पैसा उधारी में फंसा है।
क्या कंपनी का फ्री कैश फ्लो हर साल पॉजिटिव और मजबूत बना हुआ है?[cite: 1]
जवाब: इसी शुद्ध कैश (Free Cash Flow) से मैनेजमेंट शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड देता है और बिना लोन लिए भविष्य में नए प्लांट लगाता है।
क्या सेल्स की ग्रोथ रेट के मुकाबले कंपनी के डेटर्स की ग्रोथ रेट दोगुनी रफ्तार से तो नहीं भाग रही है?[cite: 1]
जवाब: अगर सेल्स 15% बढ़ रही है और उधारी 40%, तो कंपनी बस माल डंप कर रही है। पैसा कभी वापस नहीं आएगा (Bad Debts Risk)।
क्या कंपनी का डेट-टू-इक्विटी रेशियो 0.5 से कम है, या आदर्श रूप से कंपनी पूरी तरह नेट डेट-फ्री है?[cite: 1]
जवाब: मंदी के दौर में सबसे पहले भारी कर्ज वाली कंपनियां ही डूबती हैं। डेट-फ्री होना सबसे बड़ी ताकत और सेफ्टी है।
क्या कंपनी का इंटरेस्ट कवरेज रेशियो 4 या 5 के ऊपर मेंटेन है, जो उसे मंदी में डिफॉल्ट होने से बचा सके?[cite: 1]
जवाब: इसका अर्थ है कि कंपनी का ऑपरेटिंग प्रॉफिट इतना ज्यादा है कि वह अपने बैंक के ब्याज को 4-5 बार आसानी से चुका सकती है।
क्या कंपनी का आरओसीई पिछले 5 सालों से लगातार 15% से 20% के ऊपर सस्टेन कर रहा है?[cite: 1]
जवाब: कैपिटल एफिशिएंसी का सबसे कड़क नियम। कंपनी लगाई गई पूँजी पर कितना तगड़ा रिटर्न जेनरेट कर रही है, यही एक शेयर को मल्टीबैगर बनाता है।
क्या कंपनी के प्रमोटर्स ओपन मार्केट से लगातार अपनी ही कंपनी के शेयर्स खरीदकर अपनी शेयरहोल्डिंग बढ़ा रहे हैं?[cite: 1]
जवाब: प्रमोटर को कंपनी की असलियत सबसे अच्छी पता होती है। अगर वो खुद शेयर खरीद रहा है (Insider Buying), तो मतलब फ्यूचर बहुत ब्राइट है।
क्या कंपनी अपनी किसी निजी सहायक कंपनी को गलत तरीके से लोन ट्रांसफर तो नहीं कर रही है?[cite: 1]
जवाब: खराब गवर्नेस वाली कंपनियां रिटेल इन्वेस्टर्स का मुनाफा 'रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन' के जरिए अपनी पर्सनल कंपनियों में निकाल लेती हैं, जो बहुत बड़ा रेड फ्लैग है।
क्या कंपनी का करंट पीई रेशियो उसके खुद के ऐतिहासिक मीडियन पीई के मुकाबले एक मजबूत मार्जिन ऑफ सेफ्टी दे रहा है?[cite: 1]
जवाब: एक शानदार कंपनी को बहुत महंगे दाम पर खरीदना बेवकूफी है। मार्जिन ऑफ सेफ्टी तभी मिलेगी जब वैल्यूएशन ऐतिहासिक औसत के आसपास हो।